
मातृ नवमी पर विंध्याचल स्थित मां सीता कुंड में लगा आस्था का मेला, महिला तर्पण
तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।
चीफ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय
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मीरजापुर विंध्याचल
शास्त्रों में पुरुषो को ही पिंडदान व तर्पण का अधिकार दिया
गया है पर विंध्याचल के सीता कुंड पर मातृ नवमी के दिन महिलाये अपने पितरो को तर्पण करती है ,ऐसी मान्यता है की सीता कुंड पर माता सीता ने वनवास के दौरान तर्पण किया था, तभी से अपने पूर्वजो का पिंडदान करने की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। मातृ नवमी के दिन महिलाये अपने पितरो को प्रसन्न करने के लिए तर्पण व पिंडदान करती है ।धर्मनगरी काशी एवं प्रयाग के मध्य स्थित विन्ध्य क्षेत्र में माता
सीता ने श्राद्ध तर्पण किया था, जिसे सीता कुंड के नाम से जाना है , आज भी माता सीता के पैरो के निशान और विन्ध्य पहाडी से निरंतर निकलता जल
आज भी विद्यमान है , यहाँ पर तर्पण करने से पितरो की आत्मा को शांति मिलती है । मान्यता है कि भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ के आदेश पर अपने पिता राजा दशरथ को स्वर्ग प्राप्ति के लिए गया के फाल्गू नदी पर पिंडदान किया था। उसी दौरान माता सीता ने विंध्य पर्वत पर कुंड का सृजन कर पुरखों का तर्पण किया। आज भी उसी परम्परा को जीवित बनाये महिलाएं पितरों का तर्पण करती
हैं । भारतीय शास्त्र परम्परा के अनुसार पुत्रो को ही पिंडदान व
तर्पण का अधिकार है | इसमें भी सबसे बड़े व सबसे छोटा पुत्र द्वारा अर्पित किया गया जल ही पूर्वजो तक पहुँचता है | पितृ ऋण से मुक्ति व अपने पितरो को विभिन्न योनी में भटकने के बजाय उनकी तृप्ति के लिए शास्त्रों में पिंडदान बताया गया है । कहा गया है कि “पिता धर्म, पिता कर्म, पिता ही परमं तप: , पितरी मापन्ने प्रीयन्ते सर्व देवता” ।
पूर्वजो के प्रसन्न होने से सभी देवता प्रसन्न होते है । ब्रह्मांड के विन्ध्य क्षेत्र में सीता कुण्ड परम पवन स्थान है जहा माता सीता ने अपने पूर्वजो का तर्पण व पिंडदान किया था तब से इस स्थान पर मातृ नवमी के दिन महिलाये अपने पितरो को तर्पण अर्पित करती है ।स्थानीय के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश और पडोसी राज्यों समेत भारतवर्ष से महिलाएं इस पवित्र स्थान पार आती हैं और पितरों को तर्पण करती हैं ।