
मां के दरबार में लौटीं दिव्या मित्तल, तो भावनाओं से भर उठा मीरजापुर
तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।
चीफ ब्योरों कमलेश पाण्डेय
8382048247
*मंदिर से पक्का घाट और वापस आते समय जिसकी भी नजर उन पर पड़ी वह देखते ही बोल पड़ा “मां की कृपा आप पर सदैव बनी रहे दिव्या मित्तल*
*_कुछ शहर केवल कार्यस्थल नहीं होते, वे इंसान की आत्मा का हिस्सा बन जाते हैं। कुछ रिश्ते सरकारी आदेशों से नहीं बनते, बल्कि जनता के विश्वास, प्रेम और अपनत्व से जन्म लेते हैं। मीरजापुर और उसकी पूर्व जिलाधिकारी दिव्या मित्तल का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है—एक ऐसा रिश्ता, जो वर्षों की दूरी के बाद भी पहले जितना ही जीवंत और भावनाओं से भरा हुआ है।_*
*_वर्षों बाद जब दिव्या मित्तल मां विंध्यवासिनी के दरबार पहुंचीं, तो उनके कदमों में एक अधिकारी का औपचारिक भाव नहीं, बल्कि अपनी मां के आंगन में लौटती एक बेटी की श्रद्धा और अपनापन दिखाई दे रहा था। मंदिर की पहली सीढ़ी पर पहुंचते ही उन्होंने दाहिने हाथ से सीढ़ी को प्रणाम किया, फिर पूरे विधि-विधान के साथ दाहिना पैर रखकर आगे बढ़ीं। उनके होंठों पर मंत्रों का जाप था, उंगलियां ईश्वर स्मरण में लीन थीं और आंखों में भावनाओं का अथाह सागर। जैसे ही उन्होंने मां के दरबार में प्रवेश किया, उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज दिखाई देने लगा। उन्होंने स्वयं कहा, “मां के दरबार में कदम रखते ही एक अलग ही ऊर्जा मिलती है। ऐसा लगता है जैसे सारी थकान और सारी दूरी समाप्त हो जाती है।” यह केवल एक कथन नहीं था, बल्कि उनके चेहरे पर झलक रही आस्था उसका सबसे बड़ा प्रमाण थी।_*
*_शायद उसी क्षण उनके मन में वर्षों पुरानी स्मृतियां भी ताजा हो उठीं। वह दिन याद आ गया, जब मीरजापुर उन्हें विदा कर रहा था। हजारों लोगों की भीड़, नम आंखें, छलकते आंसू और आसमान से बरसती गुलाब की पंखुड़ियां… मानो पूरा शहर अपनी प्रिय जिलाधिकारी को रोक लेना चाहता हो। जिस किसी ने भी वह दृश्य देखा था, आज भी उसे भूल नहीं पाया है। कहा जाता है कि अधिकारियों का स्थानांतरण होता रहता है, लेकिन जनता जिस प्रेम से किसी को विदा करे, वह सम्मान विरले ही किसी के हिस्से आता है। दिव्या मित्तल की विदाई आज भी मीरजापुर के इतिहास की सबसे भावुक विदाइयों में गिनी जाती है।_*
*-मां के दर्शन के बाद उनके कदम सीधे मां गंगा के पावन तट, पक्का घाट की ओर बढ़े। वहां पहुंचकर वह लंबे समय तक नतमस्तक होकर मां गंगा का स्मरण करती रहीं। फिर उनकी नजर उस कल्पवृक्ष पर पड़ी, जिसे उन्होंने अपने कार्यकाल में स्वयं अपने हाथों से लगाया था। वर्षों बाद भी वह वृक्ष हरा-भरा खड़ा था, मानो अपने संरक्षक का इंतजार कर रहा हो। उस वृक्ष को देखकर उनके चेहरे पर जो संतोष और अपनापन झलका, उसने बता दिया कि सच्चे कर्म कभी समय के साथ समाप्त नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।-*
*_गंगा किनारे खड़े-खड़े उन्हें वह स्वर्णिम दौर भी याद आ गया, जब उनके नेतृत्व में विंध्य महोत्सव और मां गंगा महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ था। घाटों पर उमड़ा जनसैलाब, आसमान में गूंजती आतिशबाजी, रंग-बिरंगी रोशनी और मां गंगा की लहरों पर पड़ती उन रोशनियों की चमक… वह दृश्य आज भी मीरजापुर के लोगों की स्मृतियों में जीवित है।_*
*_पत्रकारों से बातचीत के दौरान उनकी भावनाएं कई बार शब्दों से आगे निकल गईं। उन्होंने कहा—_*
*_”यहां से जाने के बाद पहली बार आने का अवसर मिला है। पहले भी यहां आकर भावुक हो जाती थी, आज भी वैसा ही महसूस हो रहा है। मां ने फिर से दर्शन का सौभाग्य दिया, इसके लिए मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हूं। विंध्य कॉरिडोर का इतना भव्य स्वरूप देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ है।_”*
*_उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में वह राजस्व विभाग में स्पेशल सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत हैं और मीरजापुर के नए कलेक्ट्रेट भवन का निर्माण उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि इस परियोजना में जो भी बाधाएं हैं, उन्हें दूर कराने का पूरा प्रयास करेंगी।*
*लेकिन सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब उनसे पूछा गया कि आज भी मीरजापुर आपको उतना ही चाहता है। इस पर उनकी आंखों में वही अपनापन झलक उठा और उन्होंने कहा—_*
*_”जितना मीरजापुर मेरा प्रशंसक है, उससे कहीं ज्यादा मैं मीरजापुर की प्रशंसक हूं। आज मैं जो भी हूं, जैसी भी हूं, वह मीरजापुर की वजह से हूं। इसी मिट्टी ने मुझे बनाया, मुझे तराशा और मुझे पहचान दी। मीरजापुर ने मेरी झोली में इतना प्रेम भर दिया है कि मैं पूरी जिंदगी उसकी गिनती नहीं कर सकती।”_*
*उन्होंने मां विंध्यवासिनी से प्रार्थना करते हुए कहा कि मां का आशीर्वाद सदैव मीरजापुर, विंध्याचल और यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं पर बना रहे। मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “जब भी मां के दरबार में अपनी अर्जी लगाएं, तो उसमें एक अर्जी मेरी भी जोड़ दीजिए। मां सबकी मनोकामनाएं पूरी करें और सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।”*
*दिव्या मित्तल का यह दौरा केवल एक पूर्व जिलाधिकारी की यात्रा नहीं थी। यह उस अटूट रिश्ते का पुनर्मिलन था, जिसे न समय की दूरी मिटा सकी और न ही पद परिवर्तन की औपचारिकताएं कमजोर कर सकीं। मीरजापुर ने उन्हें केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं अपनाया था, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा बना लिया था।*
*शायद यही कारण है कि वर्षों बाद भी जब दिव्या मित्तल मीरजापुर आती हैं, तो शहर की गलियां, मां विंध्यवासिनी का दरबार, गंगा के घाट और यहां के लोगों की आंखें एक ही बात कहती हैं—*
*”कुछ लोग पद छोड़ देते हैं, लेकिन लोगों के दिलों से कभी विदा नहीं होते। दिव्या मित्तल उन्हीं नामों में से एक हैं।”*
*यदि इसे अखबार के प्रथम पृष्ठ की फीचर स्टोरी या और अधिक साहित्यिक एवं भावनात्मक शैली में चाहिए, तो मैं उसे भी तैयार कर सकता हूँ।*