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सोनभद्र में निजी अस्पतालों की मनमानी पर प्रशासन सख्त, डीएम ने गठित कीं तीन जांच टीमें

सोनभद्र में निजी अस्पतालों की मनमानी पर प्रशासन सख्त, डीएम ने गठित कीं तीन जांच टीमें


तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।

 

 

चीफ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय

8382048247

रैंडम जांच में एक दर्जन से अधिक अस्पतालों में मिलीं गंभीर खामियां, कहीं पंजीकृत एमबीबीएस डॉक्टर नदारद तो कहीं बिना नवीनीकरण के हो रहा संचालन; सीएचसी-पीएचसी अधीक्षकों की भूमिका भी जांच के दायरे में

सोनभद्र। जिले में निजी अस्पतालों के संचालन, पंजीकरण और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। मरीजों को बेहतर उपचार, सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। कहीं अस्पताल के पंजीकरण में दर्ज एमबीबीएस चिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं मिल रहे हैं तो कहीं पंजीकरण का नवीनीकरण कराए बिना ही अस्पतालों का संचालन किए जाने की बात सामने आ रही है। वहीं, कई स्थानों पर निर्धारित मानकों के अनुपालन में भी कमियां पाई गई हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निजी अस्पतालों की निगरानी और नियमित निरीक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाले स्वास्थ्य विभाग की ओर से पिछले तीन महीनों में कराई गई रैंडम जांच के दौरान ही एक दर्जन से अधिक अस्पतालों में विभिन्न प्रकार की अनियमितताएं सामने आई हैं। इससे जिले में निजी स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति उजागर होने लगी है। जब सीमित स्तर पर कराई गई आकस्मिक जांच में इतनी खामियां सामने आ रही हैं तो जिले के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में संचालित अन्य निजी अस्पतालों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

दूसरी ओर, जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों के अवैध अथवा मानकों के विपरीत संचालन की शिकायतें भी लगातार सामने आती रही हैं। नोडल अधिकारी की जांच के दौरान कई संस्थानों में पंजीकरण, चिकित्सकों की उपलब्धता और संचालन संबंधी व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि आखिर स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले स्वास्थ्य अधिकारियों की नजर इन संस्थानों पर समय रहते क्यों नहीं पड़ती?

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने अब प्रशासनिक स्तर पर सख्त रुख अपनाया है। डीएम ने चिन्हित निजी अस्पतालों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए तीन प्रशासनिक जांच टीमें गठित कर दी हैं। इन टीमों को संबंधित अस्पतालों में अचानक पहुंचकर जांच करने, मौके पर उपलब्ध अभिलेखों और व्यवस्थाओं का सत्यापन करने तथा अनियमितता मिलने पर तत्काल नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन की इस पहल के बाद जिले के निजी अस्पताल संचालकों में हलचल तेज होने की संभावना है।

डीएम ने गठित कीं तीन प्रशासनिक जांच टीमें, अचानक होगी पड़ताल

स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जांच में सामने आई अनियमितताओं को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने चिन्हित एक दर्जन से अधिक निजी अस्पतालों की विस्तृत जांच कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए तीन अलग-अलग प्रशासनिक टीमें गठित की गई हैं। इन टीमों में संबंधित उपजिलाधिकारी, तहसीलदार और नायब तहसीलदार के साथ निजी अस्पताल पंजीकरण के नोडल अधिकारी को शामिल किया गया है।

गठित टीमों को अस्पतालों में आकस्मिक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति का सत्यापन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जांच के दौरान अस्पताल के पंजीकरण प्रमाणपत्र, पंजीकरण की वैधता और नवीनीकरण, पंजीकरण में दर्ज चिकित्सकों की उपलब्धता, उनकी शैक्षणिक योग्यता तथा अस्पताल में उपलब्ध आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की पड़ताल की जाएगी। इसके साथ ही अस्पतालों में निर्धारित मानकों के अनुपालन और संचालन से संबंधित अभिलेखों का भी परीक्षण किया जाएगा।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जांच केवल कागजी अभिलेखों तक सीमित न रहे, बल्कि मौके पर मौजूद व्यवस्थाओं और वास्तविक संचालन की स्थिति का भी बारीकी से सत्यापन किया जाए। यदि किसी अस्पताल में नियमों का उल्लंघन अथवा गंभीर अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित के विरुद्ध नियमानुसार तत्काल कार्रवाई की जाए। प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त टीम द्वारा जांच कराए जाने से इस बार निरीक्षण की निष्पक्षता और जवाबदेही पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

तीन माह की रैंडम जांच में एक दर्जन से अधिक अस्पतालों में मिलीं खामियां

जिले में निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों के संचालन को लेकर शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर कस्बाई इलाकों तक निजी स्वास्थ्य संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें से प्रत्येक संस्थान का वैध पंजीकरण, योग्य चिकित्सकों की उपलब्धता और निर्धारित स्वास्थ्य मानकों का पालन सुनिश्चित कराना स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

इसके बावजूद पिछले तीन महीनों में स्वास्थ्य विभाग की ओर से कराई गई रैंडम जांच में एक दर्जन से अधिक अस्पतालों में कमियां सामने आना विभागीय निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। जांच के दौरान कहीं पंजीकरण में दर्ज एमबीबीएस चिकित्सक अस्पताल में उपस्थित नहीं मिले तो कहीं पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं कराया गया था। कुछ संस्थानों में संचालन से जुड़े निर्धारित मानकों के अनुपालन में भी कमियां पाई गईं।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाले मरीज संचालकों के दावों और पंजीकरण में दर्ज चिकित्सकों की जानकारी पर भरोसा करते हैं। ऐसे में यदि पंजीकरण में किसी चिकित्सक का नाम दर्ज है, लेकिन वह नियमित रूप से अस्पताल में उपलब्ध नहीं है तो मरीजों को उपचार के दौरान परेशानी और जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं में इस प्रकार की लापरवाही को केवल कागजी कमी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नोडल अधिकारी के भरोसे पूरी व्यवस्था, सीएचसी-पीएचसी अधीक्षकों की जवाबदेही पर सवाल

निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों की निगरानी की जिम्मेदारी केवल जिला स्तर पर तैनात नोडल अधिकारी तक सीमित नहीं है। संबंधित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी करने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के अधीक्षकों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर संचालित निजी स्वास्थ्य संस्थानों की जानकारी रखना, समय-समय पर निरीक्षण करना और नियमों के विपरीत गतिविधियां सामने आने पर उच्चाधिकारियों को अवगत कराना उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसके बावजूद विभिन्न क्षेत्रों से अवैध और मानकविहीन अस्पतालों के संचालन की शिकायतें लगातार सामने आने से स्थानीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि कार्रवाई की पूरी जिम्मेदारी जिला स्तर के नोडल अधिकारी पर छोड़ दी जाती है, जबकि संबंधित सीएचसी और पीएचसी के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा आवश्यक है।

आखिर जिन क्षेत्रों में लंबे समय से निजी अस्पताल और पैथोलॉजी सेंटर संचालित हो रहे हैं, वहां स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को उनकी गतिविधियों और पंजीकरण की स्थिति की जानकारी क्यों नहीं रहती? क्या नियमित निरीक्षण की व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू हो रही है? यदि अनियमितताएं पहले से संचालित थीं तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? ऐसे सवालों का जवाब मिलना भी जरूरी है।

प्रशासनिक जांच के साथ-साथ संबंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य अधिकारियों की जिम्मेदारी और उनके द्वारा किए गए निरीक्षणों की भी समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि निगरानी में लापरवाही पाए जाने पर जवाबदेही तय हो सके।

रैंडम जांच ने खोली विभागीय निगरानी की पोल

स्वास्थ्य विभाग की ओर से निजी अस्पतालों की कराई गई रैंडम जांच में सामने आई खामियां इस बात का संकेत हैं कि केवल पंजीकरण जारी कर देना ही मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पंजीकरण के बाद भी अस्पताल निर्धारित शर्तों का पालन कर रहे हैं या नहीं, पंजीकृत चिकित्सक वास्तव में उपलब्ध हैं या नहीं तथा अस्पताल का नवीनीकरण समय पर कराया जा रहा है या नहीं, इसकी नियमित निगरानी जरूरी है।

प्रारंभिक जांच में अनियमितताएं सामने आने के बाद जिलाधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग से विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की थी। अब प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त टीम के माध्यम से इन कमियों का दोबारा सत्यापन कराया जा रहा है। इस जांच का उद्देश्य केवल अस्पतालों की कमियां गिनाना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से निर्धारित निगरानी प्रक्रिया का पालन किस स्तर तक किया जा रहा है।

यदि किसी अस्पताल के पंजीकरण में दर्ज चिकित्सक मौके पर उपलब्ध नहीं हैं तो इसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। इसी तरह नवीनीकरण के बिना संचालन, आवश्यक अभिलेखों की कमी और निर्धारित मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित अस्पताल संचालकों के विरुद्ध नियमों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि, केवल कागजी कार्रवाई से नहीं चलेगा काम

निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले अधिकांश मरीज बेहतर सुविधा की उम्मीद में पहुंचते हैं। कई बार गंभीर बीमारी, आपातकालीन स्थिति और आर्थिक मजबूरी के कारण मरीज निजी अस्पतालों का सहारा लेते हैं। ऐसे में अस्पतालों में योग्य चिकित्सकों की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती, आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था और निर्धारित मानकों का पालन होना बेहद जरूरी है।

यदि अस्पताल केवल पंजीकरण के आधार पर अपनी वैधता का दावा कर रहे हैं, लेकिन मौके पर आवश्यक चिकित्सक और सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं तो यह मरीजों के विश्वास के साथ खिलवाड़ है। स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिले में संचालित प्रत्येक निजी अस्पताल नियमों के अनुरूप सेवाएं दे और किसी भी मरीज की जान या स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो।

जांच के बाद बड़े एक्शन की उम्मीद, निगरानी व्यवस्था में बदलाव की भी जरूरत

जिलाधिकारी चर्चित गौड़ के निर्देश पर गठित तीनों प्रशासनिक टीमें अब चिन्हित निजी अस्पतालों की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करेंगी। आकस्मिक जांच में पंजीकरण, नवीनीकरण, पंजीकृत चिकित्सकों की उपस्थिति, आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं और निर्धारित मानकों के अनुपालन की जांच की जाएगी। अनियमितता प्रमाणित होने पर संबंधित संस्थानों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

हालांकि, इस पूरी कवायद का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब जांच के निष्कर्षों के आधार पर निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई हो तथा भविष्य में भी नियमित निरीक्षण की व्यवस्था कायम रखी जाए। इसके साथ ही जिन क्षेत्रों में अवैध अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों के संचालन की शिकायतें मिल रही हैं, वहां स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक जांच में कितने अस्पतालों की अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, कितनों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था में कितनी सुधारात्मक पहल होती है। जिले के मरीजों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है कि कार्रवाई केवल जांच और नोटिस तक सीमित न रहे, बल्कि उसका असर जमीन पर भी दिखाई दे।


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