
सोनभद्र में विंध्य पर्वत श्रृंखला में स्थित ऐतिहासिक पंचमुखी पर्वत अपने अस्तित्व के सबसे संकटपूर्ण दौर से गुजर रहा है।
तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।
चीफ़ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय
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यह पर्वत केवल प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के क्रमिक विकास का जीवंत साक्ष्य माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं और पुरातात्विक तथ्यों के अनुसार, यही वह स्थान है जहाँ आदिमानव ने खानाबदोश जीवन छोड़कर पहली बार गुफाओं को स्थायी आश्रय बनाया था। हजारों वर्ष पुराने इन गुफाओं में मौजूद दुर्लभशैलचित्र आज मानवीय लापरवाही और बर्बरता की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। गुफाओं की दीवारों पर उकेरे गए इन ऐतिहासिक चित्रों पर लोग पत्थरों से लकीरें खींच रहे हैं, जिससे उनकी मूल आकृतियां नष्ट हो रही हैं। इसके अलावा, गुफाओं के भीतर पिकनिक मनाने और मांस पकाने जैसी गतिविधियों से निकलने वाला धुआं शैलचित्रों पर कालिख की परत चढ़ा रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण के लिए न तो कोई सरकारीसुरक्षा व्यवस्था है और न ही कोई संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। संरक्षण के अभाव में आदि-सभ्यता के ये दुर्लभ प्रमाण धीरे-धीरे धुंधले होते जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक उपेक्षा को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। मामले की गंभीरता को देखते हुए रॉबर्ट्सगंज ब्लॉक प्रमुख ने लोगों से भावुक अपील करते हुए कहा कि पंचमुखी पर्वत के शैलचित्र हमारी साझा विरासत हैं और इन्हें बचाना समाज और प्रशासन, दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो विश्व इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए मिट जाएगा।