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जेल में मैला उठाया और कोड़े खाए, फिर भी न टूटा हौसला

जेल में मैला उठाया और कोड़े खाए, फिर भी न टूटा हौसला


तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।

 

चीफ़ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय

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घोरावल। जब तक भारत माता गुलामी की जंजीरों से मुक्त नहीं हो जाती, तब तक जेल ही मेरा घर है… यह पंक्ति स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शारदा प्रसाद सिंह ने अपने पिता से तब कही थी, जब महज 18 साल की उम्र में 1941 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा। पिता के समझाने पर भी उन्होंने घर लौटने से इन्कार कर दिया था। मझिगवां गांव में 2 मार्च 1923 को जन्मे शारदा प्रसाद किशोरावस्था से ही महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल से प्रभावित थे। ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने के कारण 16 अप्रैल 1941 को तत्कालीन मजिस्ट्रेट फजीलुद्दीन अहमद ने उन्हें छह माह की कड़ी सजा और 50 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई21 सितंबर 1941 को रिहा हुए। जेल में उनका मनोबल तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने उनसे मैला उठवाया, चक्की पिसवाई और कोड़े बरसाए, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा।उनकी बहू दमयंती देवी बताती हैं कि वे दो बार जेल गए थे। 25 दिसंबर 1998 को 75 वर्ष की आयु में शारदा प्रसाद का निधन हो गया था


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