
बिजली की झालरों और चाइनीज सजावटी सामान के बीच पुश्तैनी कारोबार बचाने की जद्दोजहद, नई पीढ़ी भी मिट्टी के हुनर को बना रही भविष्य का आधार
तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।
चीफ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय
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सोनभद्र। दीपावली का त्योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे-वैसे जिले के कुम्हार परिवारों के घरों में चाक की रफ्तार तेज होती जा रही है। सुबह की पहली किरण से लेकर देर शाम तक कहीं चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार किए जा रहे हैं तो कहीं कलश, ढक्कन, कुल्हड़ और पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाले अन्य बर्तन बनाए जा रहे हैं। त्योहार की तैयारियों में परिवार का हर सदस्य अपनी भूमिका निभा रहा है। किसी के हाथ मिट्टी गूंथने में व्यस्त हैं तो कोई चाक पर दीये बना रहा है। महिलाएं दीयों की नक्काशी और सजावट में जुटी हैं। वहीं बच्चे तैयार दीयों को संभालकर सुरक्षित स्थानों पर रखने में मदद कर रहे हैं। कुम्हार परिवारों के लिए दीपावली केवल रोशनी और खुशियों का त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत के बाद आमदनी जुटाने का एक बड़ा अवसर भी है।
बदलते समय के साथ बाजार में बिजली की झालरों, रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों और आधुनिक सजावटी सामानों का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके चलते पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग पहले की अपेक्षा प्रभावित हुई है। बावजूद इसके कुम्हारों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं हैं। उन्हें भरोसा है कि इस बार लोग स्वदेशी परंपरा को अपनाते हुए अपने घरों की चौखट, आंगन, छत और मंदिरों में मिट्टी के दीये जलाकर दीपावली मनाएंगे। कुम्हार परिवारों को उम्मीद है कि यदि लोग स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदेंगे तो न केवल भारतीय संस्कृति और परंपरा को मजबूती मिलेगी, बल्कि उनके पुश्तैनी कारोबार को भी सहारा मिलेगा।