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सर वी. एन. राव – भारतीय संविधान के वास्तविक निर्माता

सर वी. एन. राव – भारतीय संविधान के वास्तविक निर्माता


तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।

 

चीफ़ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय

8382048247

✍️ लेखक : इंजीनियर प्रकाश पाण्डेय

संपादक – तेजस्वी संगठन पत्रिका

(तेजस्वी संगठन ट्रस्ट, उत्तर प्रदेश)

 

 

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और लोकतांत्रिक संविधान माना जाता है।

किन्तु इसके निर्माण में जिन व्यक्तित्वों का योगदान रहा, उनमें कुछ नाम राजनीतिक कारणों से इतिहास के पन्नों में पीछे छूट गए।

ऐसा ही एक नाम है — सर वी. एन. राव, जो भारतीय संविधान के वास्तविक निर्माता, तकनीकी संरचनाकार और वैधानिक रूपरेखा के मूल अभियंता थे।

यह लेख उनके जीवन, योगदान और ऐतिहासिक प्रासंगिकता को उजागर करता है।

 

 

भारत की स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण का कार्य इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी।

संविधान सभा के गठन के समय अनेक विधि विशेषज्ञों और प्रशासकों की सेवाएँ ली गईं।

परंतु संविधान का जो मूल प्रारूप और कानूनी ढांचा तैयार हुआ, वह सर वी. एन. राव जी के प्रयासों का परिणाम था।

 

जहाँ डॉ. भीमराव आंबेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया, वहीं वास्तविक प्रारूप वी. एन. राव जी ने पहले ही तैयार कर लिया था।

वे उस समय भारत सरकार के संविधान सलाहकार के पद पर कार्यरत थे।

 

🔶 जीवन परिचय

 

सर वी. एन. राव जी का जन्म 1890 के दशक में दक्षिण भारत के एक शिक्षित परिवार में हुआ।

वे एक उच्च शिक्षित विधिवेत्ता थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासनकाल में कानून और प्रशासन का गहन अध्ययन किया।

उन्होंने इंग्लैंड से कानून की उच्च उपाधि प्राप्त की और भारत सरकार में कानूनी सलाहकार के रूप में कार्य किया।

 

उनकी विद्वता और तर्कशक्ति के कारण उन्हें संविधान निर्माण विभाग का प्रमुख तकनीकी विशेषज्ञ बनाया गया।

 

 

🔶 संविधान निर्माण में भूमिका

 

भारतीय संविधान की प्रारंभिक नींव भारत सरकार अधिनियम 1935 पर आधारित थी।

इस अधिनियम को भारतीय स्वरूप में ढालने और इसे आधुनिक संविधान के रूप में विकसित करने का दायित्व सर वी. एन. राव को दिया गया।

 

उन्होंने अनेक महीनों तक ब्रिटिश प्रशासनिक अभिलेखों, भारतीय शासन व्यवस्था और प्रांतीय कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन किया।

उनके द्वारा तैयार प्रारूप में —

 

1. संघीय ढांचे की रूपरेखा

 

2. केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन

 

3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता

 

4. नागरिक अधिकारों की संरचना

 

5. संविधान की कानूनी भाषा का निर्धारण

 

 

— जैसे महत्त्वपूर्ण बिंदु शामिल थे।

संविधान सभा में प्रस्तुत अधिकांश अनुच्छेद राव जी द्वारा तैयार प्रारूप पर ही आधारित थे।

 

 

🔶 राजनीतिक समीकरण और नेहरू का निर्णय

 

जब संविधान प्रारूप समिति का गठन हुआ, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस नेतृत्व ने डॉ. भीमराव आंबेडकर को उसका अध्यक्ष नियुक्त किया।

यह निर्णय राजनीतिक संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व के आधार पर लिया गया था।

 

हालाँकि तकनीकी मसौदा पहले ही वी. एन. राव द्वारा तैयार किया जा चुका था।

डॉ. आंबेडकर ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनके पास “संविधान का पूर्व मसौदा” था, जिसे उन्होंने संशोधित रूप में सभा के सामने प्रस्तुत किया।

 

अतः वास्तविक लेखक और विधिक संरचनाकार सर वी. एन. राव थे, जबकि डॉ. आंबेडकर उसके अध्यक्षीय प्रतीक बने।

 

 

🔶 संविधान का तकनीकी ढांचा

 

सर वी. एन. राव जी की विधिक दृष्टि ने भारतीय संविधान को विश्वस्तरीय स्वरूप प्रदान किया।

उनके द्वारा तैयार संविधान के ढांचे में निम्न विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं —

 

कानून की सर्वोच्चता

 

संविधान की कठोरता और लचीलापन

 

संघीय ढांचा तथा एकात्मक प्रवृत्ति

 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

 

संविधान संशोधन की सटीक प्रक्रिया

 

 

उनका अनुच्छेदवार प्रारूप (धारा-दर-धारा) ही आगे चलकर भारतीय संविधान का मसौदा बना।

 

🔶 उपेक्षित योगदान

 

स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में जातीय राजनीति और विचारधारात्मक संघर्षों के कारण कई सच्चे योगदानकर्ताओं के नाम इतिहास से मिटा दिए गए।

सर वी. एन. राव भी उन्हीं में से एक थे।

वे एक अनुशासित, तथ्यनिष्ठ और गहन अध्ययनशील विधिवेत्ता थे, जिन्हें कभी जन-प्रचार की आवश्यकता नहीं पड़ी।

 

उनका कार्य इतना व्यापक था कि उनके बिना भारतीय संविधान का वैधानिक स्वरूप अधूरा रहता।

दुर्भाग्यवश, शैक्षिक पुस्तकों और इतिहास के पाठ्यक्रमों में उनके नाम का उल्लेख बहुत सीमित कर दिया गया।

 

 

🔶 ऐतिहासिक महत्व

 

भारतीय संविधान निर्माण को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है —

 

1. प्रशासनिक विधिक ढांचे का विकास (1861–1935)

 

2. सर वी. एन. राव द्वारा तकनीकी रूपांतरण (1935–1947)

 

3. संविधान सभा द्वारा अनुमोदन (1947–1950)

 

 

इन तीनों में दूसरा चरण सबसे निर्णायक था।

सर वी. एन. राव ने संविधान को कानूनी दृढ़ता, प्रशासनिक स्थिरता और लोकतांत्रिक संतुलन प्रदान किया।

 

भारत का संविधान केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है।

इस विचारधारा के वास्तविक निर्माता सर वी. एन. राव थे, जिनकी बौद्धिक क्षमता और विधिक सूझबूझ ने भारत को विश्व का सबसे सशक्त लोकतंत्र बनाया।

 

राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भले ही उनका नाम इतिहास में ओझल कर दिया गया, परंतु संविधान की हर धारा में आज भी उनका योगदान सजीव है।

अब समय है कि राष्ट्र उनके योगदान का पुनर्मूल्यांकन करे और उन्हें उचित सम्मान प्रदान करे।

 

🔶 संदर्भ

 

1. भारत सरकार अधिनियम, 1935 – प्रारूप अभिलेख

 

2. संविधान सभा की बहसें (खंड 1 से 11)

 

3. भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार – विधिक प्रारूप अनुभाग (1946–47)

 

4. प्रो. एस. एन. मुखर्जी – भारतीय संविधान का विकास (दिल्ली विश्वविद्यालय, 1961)

 

5. प्रशासनिक सुधार आयोग प्रतिवेदन (1950–55)


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