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तेजस्वी संगठन ट्रस्ट।
चीफ़ ब्यूरो कमलेश पाण्डेय
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घंटाघर की दरक रही दीवार, ऐतिहासिक भवनों का नहीं दिया जा रहा ध्यानमिर्जापुर। कभी देश की व्यापारिक राजधानी रही मिर्जापुर के ऐतिहासिक भवन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। घंटाघर 1891 में बना एक ऐतिहासिक स्मारक है। इसे गुलाबी पत्थरों और रोमन शैली की नक्काशी से निर्मित किया गया है। यह घंटाघर गुरुत्वाकर्षण पर चलने वाली लंदन-निर्मित घड़ी और 300 किलोग्राम के घंटे के साथ अपनी वास्तुकला और यांत्रिक घड़ी के लिए प्रसिद्ध है। वर्तमान में इसकी दीवारें देख-रेख के अभाव में दरक रही हैं। भवन खराब स्थिति में है। भवन जर्जर हो रहा है तो दीवारें गिरने की कगार पर है। यही हाल तीन सौ वर्ष पहले रुई कारोबारियों के एक दिन की कमाई से बने ओझला पुल का भी है। इस पुल की भी हालत ठीक नहीं है। प्राकृतिक सुंदरता समेटे मिर्जापुर में कई ऐसे निर्माण भी हैं, जो कलाकृति के बेहतरीन नमूने हैं। इसमें से एक है पुण्यजला नदी पर बना विंध्याचल और मिर्जापुर को जोड़ने वाला ओझला पुल। बाहर से आने वाले व्यापारियों ने एक दिन का चंदा जुटाकर इस पुल के लिए दान दिया और विंध्याचल के महंत परशुराम गीरी ने पुल का निर्माण कराया। मिर्जापुर के प्रस्तर कला में माहिर कारीगरों की नक्काशी आज भी पुल के आकर्षण हैं। इस पुल के गर्भ में व्यापार के सिलसिले में आए हुए व्यापारियों को ठहरने के लिए स्थान भी बनाया गया था जो अब जर्जर हो गया है बल्कि दीवारों में दरारें आ चुकी है। आज यह पुल मरम्मत के अभाव की बाट जोह रहा है। वहीं घंटाघर का भवन भी जर्जर हो रही है। समय रहते इसकी मरम्मत पर ध्यान नहीं दिया गया तो इस भवन की पीछे की दीवार जमींदोज हो सकती है। सफाई पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से भवन की दीवारों पर काले धब्बा पड़ गए हैं। नगर पालिकाध्यक्ष श्याम सुंदर केसरी ने कहा कि वंदन योजना के तहत घंटाघर का सुंदरीकरण हो रहा है। मुख्य भवन में यदि कोई समस्या है तो इसको दिखवाया जाएगा और पुरातत्व विभाग से सलाह लेकर उसका निराकरण किया जाएगा।